एक आवाह्न :
जैविक-क्रांति
से जुड़कर अन्न-स्वराज 2020 को सफल बनाएं !

भोजन से हमें पोषण मिलता है। कृषि हमारे भोजन और आजीविका का सबसे प्रमुख स्रोत है। हालांकि, आजतक 300000 से भी किसानों की आत्महत्या के चलते खेती हमारे लिए अभिशाप जैसी बन चुकी है। वहीं, जीवन के लिए ऊर्जा स्रोत यह भोजन आज कई बीमारियों को जन्म दे रहा है। आज हम खेती में ह्रास के साथ ही भोजन, स्वास्थ्य तथा पारिस्थितिक संकट को झेल रहे हैं। चाहे ग्रामीण हो या शहरी, महिला हो या पुरूष, छोटा हो या बड़ा, किसान हो या उपभोक्ता सभी पारिस्थितिक संकटों से ग्रस्त हैं। हम मिलकर जैविक क्रांति के माध्यम से इस संकट से मुक्ति पा सकते हैं। आइए, स्वतंत्र भारत के स्वास्थ्य और पारिस्थितिकीय स्थिरता के लिए जैविक-क्रांति से जुड़िए और अन्न-स्वराज 2020 को सफल बनाइए!

जीवन जीना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

पारिस्थितिकीय संकट

मिट्टी


आज से 4000 वर्ष पूर्व हमारे वेदों ने हमारा मार्गदर्शन किया- ’मुट्ठी भर मिट्टी पर हमारा जीवन निर्भर है। इसकी देखभाल करें, ताकि यह हमारे लिए प्राकृतिक सौंदर्य के साथ भोजन, ईंधन, तथा घर प्रदान करे। यदि इस मिट्टी के साथ छेड़खनी करोगे तो इसकी जीवटता समाप्त हो जाएगी। अतः मिट्टी के साथ भी मानवता पूर्ण व्यवहार करो।’

हरित क्रांति के गैर टिकाऊ मॉडल के चलते भारतीय मिट्टी और पानी संकटग्रस्त हो गये हैं। भारत में उर्वरक, कीटनाशक तथा खरपतवार नाशकों के अंधाधुध इस्तेमाल से प्रत्येक वर्ष 5334 लाख टन मिट्टी बर्बाद होती है। इस तरह से हमारे देश को सालाना 16.4 टन प्रति हेक्टेयर सालाना मिट्टी की क्षति होती है।

भू-स्वराजः हमारा जन्म सिद्ध अधिकार

पानी

इस समय समूचा देश भीषण जल संकट के दौर से गुजर रहा है। इस संकट से देश के 33 करोड़ लोग प्रभावित हैं। नदी तथा भूमिगत जल का शोषण और हरित-क्रांति आधारित सघन कृषि प्रणाली ने अधिक जल आधारित फसलों को बढ़ावा देने से, मिट्टी की जल-संचय क्षमता की संरचना से छेड़छाड आदि जल संकट के कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण भी सूखा पड़ जाता है। ज्ञात हो कि मौसम परिवर्तन में औद्योगिक कृषि का योगदान 50 प्रतिशत है।
जल मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च अंत तक भारत के 91 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर मात्र 25 प्रतिशत रह गया है जोकि पिछले एक दशक में भंडारित कुल जल का 25 प्रतिशत है। तथाकथित हरित-क्रांति ने लगातार पानी की खपत पर जोर दिया। मौसम परिवर्तन के चलते जल संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। औद्योगिक कृषि ग्रीन हाउस गैस में 50 प्रतिशत का योगदान देती है। हालात यह हैं कि किसान अपने खेती छोड़कर पलायन करने और शरणार्थियों-सा जीवन जीने के लिए मजबूर है। बुंदेलखण्ड में लगभग 60 प्रतिशत लोग जबरन ही गांवों से शहरों की तरफ विस्थापित हो गये हैं।

2013-14 की बाढ़ के कारण चार राज्यों के 19.3 करोड़ लोग प्रभावित हुए और 19,000 करोड़ की आर्थिक क्षति हुई। इस आपदा से एकेले उत्तराखण्ड को 3000 करोड़ की हानि उठानी पड़ी।

जल- स्वराजः हमारा जन्म सिद्ध अधिकार

कृषि संकट

किसानों की आत्महत्या

1995 से अब तक 300,000 से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। ये आत्महत्यायें अधिकतर बी.टी. कपास उत्पादक क्षेत्रों में हुई हैं। अब तक किसानों की कुल हुई आत्महत्या में से 75 प्रतिशत एकेले महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ में हुई हैं। जनवरी से दिसंबर 2015 के बीच, महाराष्ट्र में 3228 किसानों ने आत्महत्या की, जिनमें से विदर्भ में 1,536 और मराठवाड़ा में 1,454 किसानों की आत्महत्या हुई हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे बीजों पर अपना नियंत्रण कर उनसे रॉयल्टी प्राप्त करने की कोशिश कर रही हैं। मंहगे बीज, रसायन और मशीनरी के चलते किसान कर्ज की गर्त में फंसता जा रहा है। 8 मार्च, 2016 को केंद्र सरकार ने बी.टी. कपास के मूल्य पर नियंत्रण करने हेतु कदम उठाया। सरकार तथा नवधान्य के इस प्रयास पर कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अपनी मुहर लगा दी।

2013-14 की बाढ़ के कारण चार राज्यों के 19.3 करोड़ लोग प्रभावित हुए और 19,000 करोड़ की आर्थिक क्षति हुई। इस आपदा से एकेले उत्तराखण्ड को 3000 करोड़ की हानि उठानी पड़ी।

भोजन आयात के माध्यम आ रही गुलामीभारत को वर्तमान में दाल और तिलहन की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिसके कारण हमारे मुख्य आहार से दाल तो गायब ही हो गई है और उसका स्थान पीली मटर जैसी नकली दालों ने ले लिया है। तेल के आयात ने तो 2017 तक 25 प्रतिशत स्वास्थ्य-वर्धक तेल की अनुपलब्धता निश्चित कर दी है। ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे देश में दाल और तिलहन की कृत्रिम कमी को दर्शाकर किसान तथा उपभोगताओं को जी.एम सरसों तथा जी.एम सोया बीन की ओर प्रेरित कर उनका शोषण करने के लिए तैयारी कर रहे हैं।

ऋण :एक सर्वे के मुताबिक भारत के कुल में से लगभग आधे किसान कर्ज के बोझ तले जी रहे हैं। राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (एन.एस.एस.ओ) द्वारा किए गए एक सर्वे में बताया गया कि भारत के लगभग 89,35 करोड़ ग्रामीण कृषि कार्य में लगे हुए हैं जिसमें से आधी जनसंख्या कर्ज के बोझ तले दबी हुई है। महंगे बीज, महंगी खाद और महंगी मशीनरी के बावजूद फसल की असफल से कर्ज की स्थिति आ जाती है। वहीं, कृषि-पारिस्थितिकी के आधार पर खेती किसान को कर्जमुक्त रखती है।

वैश्वीकरण/ मुक्त व्यापार और हमारी भोजन-सम्प्रभुता का नाश :कृषि, स्वास्थ्य एवं कुपोषण सम्बधी सभी संकट का मूल विश्व व्यापार संघ द्वारा बीजों पर एकाधिकार और अशुद्ध एवं विषयुक्त भोजन तथा जंक फूड का अनुचित भण्डारण करना है।

बीमारी और कुपोषण संकट :देश में भोजन से संबंधित अनुचित जीवन शैली के कारण मोटापा, मधुमेह, बांझपन जैसी बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। कैंसर एक ऐसी प्रमुख बीमारी है जो देश के ग्रामीण और शहरी जीवन को समान रूप से प्रभावित कर रही है। नकदी फसलों की जगह, पौष्टिक एवं स्वास्थ्य-वर्धक भोजन के उत्पादन से प्रति एकड़ अधिक पोषण युक्त एवं स्वस्थ खाद्य पदार्थ उत्पादित करें। ऐसा करने से प्रति एकड़ अधिक पोषण प्राप्त होगा जिससे हमारी खाद्य सुरक्षा में बढ़ोत्तरी होगी।

जैव चोरी और पेटेंट एकाधिकार : बीज तथा औषधियों पर एकाधिकार करने हेतु वैश्विक कम्पनियां ने ट्रिप्स नामक अनुबंध किया। गणतांत्रिक प्रक्रिया में पेटेंट हेतु अधिनियम 3-डी और 3-जे तथा पौध किस्म रक्षा के तहत किसान अधिकार कानून हमारे अधिकारों के रक्षक हैं। वैश्विक कम्पनियां बीजों की चोरी और देशी ज्ञान की चोरी के लिए प्रयासरत हैं। नवधान्य ने नीम, गेहूं, बासमती और खरबूज की जैवचोरी और पेटेंट के विरूद्ध सफलता अर्जित की है। दुर्भाग्य है कि नया बौद्धिक सम्पदा अधिकार हमारी जैवविविधता और देशी ज्ञान की चोरी का खुलाद्वार बन गया है। नया बौद्धिक सम्पदा अधिकार हमारी जैवविविधता और देशी ज्ञान की चोरी के साथ सार्वजनिक अधिकारां को बाधित करने तथा वैश्विक कम्पनियों के एकाधिकार का खुलाद्वार बन गया है।

ज्ञान स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।

अन्न-स्वराज के लिए जैविक-क्रांति

हमारा अभियानः मिट्टी, पानी और जैव-विविधता के पुनर्जीवन से भारतीय कृषि, भोजन एवं स्वास्थ्य को नवजीवन प्रदान करना

जैविक क्रांति, पारिस्थितिक तथा आर्थिकी के आधार यथा; जैव-विविधता, जल तथा मिट्टी को पुनर्जीवित करने के लिए एक अनिवार्य कदम है। जैविक खेती के संरक्षण तथा संसाधनों के पुनःरक्षण से महंगे बीज तथा जहरीले रसायनों की खरीद से किसानों को मुक्ति मिलेगी। ऐसा करने से हम बीमारियों से दूर रहेंगे और स्वस्थ होंगे। जैविक क्रांति के माध्यम से जीवन को पुनर्जीवंत करने के लिए हमसे जुड़िये।

  1. बीज स्वराज की : बीज सम्प्रभुता के लिए सामुदायिक बीज बैंकों की स्थापना के माध्यम से स्थानीय बीज प्रजातियों को कई गुना करके स्वदेशी बीज व पौधों को जैवचोरी होने से बचाएं। बीज सत्याग्रह से जुड़कर बीज और जीवन पर किये जा रहे पैटेंट को रोकने में मदद कीजिए। बी.टी. कपास जैसे जी.एम बीजों का बहिष्कार कीजिए।
  2. जैव-विविधता को पुनर्जीवन : जैव-विविधता को पुनर्जीवन देने के लिए विभिन्न तरह की परम्परागत फसलें यथा; दाल, मोटा अनाज, स्थानीय प्रजातियां तथा मिश्रित खेती को बढ़ावा देना होगा, एकल खेती को नहीं। जैव-विविधता आधारित खेती से प्रति एकड़ अधिक पोषण युक्त भोजन उत्पन्न होता है।
  3. जैविक खेती को बढ़ावा : खेती-किसानी को वाह्य रसायनों से मुक्त रखने के लिए परम्परागत खेती की उन तरीकों को अपनाना होगा जो तरीके भारतीय खेती को पिछले 8000 वर्षों से टिकाऊ बनाये हुए हैं।
  4. जैविक खेती से जल का पुनर्संचय : मिट्टी में उपस्थित 0.5 प्रतिशत जैविक तत्व प्रति हेक्टेयर 80,000 हजार लीटर पानी को संरक्षित करने की क्षमता रखते हैं। हमें मोटे अनाजों के उत्पादन पर ध्यान देना होगा, जोकि अच्छे पोषक होने के साथ बड़ी मात्रा में जल-संचय करने में सहायक हैं। हमारी आवश्यकता प्रति बूंद अधिक फसल न होकर प्रत्येक फसल से अधिक जल प्राप्त करने की है। विविधतापूर्ण जैविक तंत्र जल को पुनर्जीवित करता है। जल-सत्याग्रह के माध्यम से जल के निजीकरण का विरोध और जल-संरक्षण कर देशवासियों के अधिकार की रक्षा करें।
  5. जैविक खेती से पुनर्जीवंत मिट्टी :जैविक खेती के माध्यम से मिट्टी को फिर से जीवंत कर अपनी भूमि को हड़पे जाने से बचाएं। मिट्टी की उर्वरता को बचाने, जल संरक्षण क्षमता को बढ़ाने, मृदा-क्षरण आदि को रोकने के लिए भू-स्वराज को अपनाएं।
  6. जैव-विविधता तथा जैविक खेती के साथ जलवायु के प्रति लचीले (सम्मत) तंत्र की स्थापना करें। हमारे भोजन-तंत्र की निरंतरता के लिए स्थानीय बीजों को बढ़ावा देकर जैविक खेती को अपनाना अति आवश्यक है तभी हम निरंतर हो रहे जलवायु परिवर्तन में स्थिरता ला सकेंगे।
  7. आशाओं के बाग : अपने घर की छत, खेत, सागवाड़ी, स्कूल, पंचायत, गांव और शहर के प्रत्येक स्थान पोषणुक्त फसलें तथा बागानों की स्थापना से आशाओं के बाग स्थापित कर पोषण सम्प्रभु बनिए। ऐसा करके स्वास्थ्य की बागडोर अपने हाथों में रखिए।
  8. अच्छे स्वास्थ्य और टिकाऊ आजीविका के लिए भोजन की स्थानीय एवं स्वदेशी प्रसंस्करण पद्यति को बढ़ावा दें। हमारी विविध भोजन संस्कृति को बचाने के लिए ’महिला अन्न-स्वराज’ समूहों से जुड़िये। लेड तथा अन्य जहर युक्त औद्योगिक प्रसंस्करित भोजन के साथ ही जंक फूड का बहिष्कार कीजिए।
  9. अन्न स्वराज 2020 को सफल बनाएंःअपने घर, गांव, शहर और सम्पूर्ण देश को किसान तथा उपभोगताओं को एक-दूसरे से जोड़ने वाले नेटवर्क यानी ’अन्नपूर्णा तंत्र’ से जोड़कर भारत को भोजन सम्पन्न बनाने में मदद करें। विकेंद्रीकृत तथा पारदर्शी मूल्य तंत्र से छद्म सब्सिडी पर लगने वाले अरबों रूपयों को बचाने में सहायक बनें। ऐसा करके प्रत्येक व्यक्ति तक जैविक भोजन पहुंचाकर देश को स्वस्थ एवं पोषण सम्पन्न बनाने में भागीदार बनिए।

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